1947 आजादी के समय रुपया प्रति डॉलर ₹3.30, उसके बाद 1950 से 1966 तक, रुपया प्रति डॉलर ₹4.76 पर बना रहा । इसका मुख्य कारण नियंत्रण और सीमित व्यापार था।
1935 में स्थापित RBI धीरे धीरे भारत की नई सरकार के नियंत्रण में में आ रहा था ।
वास्तविकता 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और 1966 के भीषण सूखे के बाद दिखाई देने लगीं। इसने भारत की अर्थव्यवस्था को हिला दिया था ।

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आई और अंतर्राष्ट्रीय ऋणदाताओं (जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक) ने वित्तीय सहायता के बदले रुपये का अवमूल्यन करने के लिए भारत पर दबाव डाला।
इसके बाद 1966 में, भारत ने आधिकारिक तौर पर रुपये का अवमूल्यन करके इसे प्रति डॉलर ₹7.50 कर दिया।

1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को घुटने टिकवा कर धूल चटा दी लेकिन रुपया धीरे धीरे फिसलता रहा और 1973 के तेल संकट जो कि OPEC के तेल प्रतिबंध के कारण था उसकी वजह से तेल की कीमतों में भारी उछाल आया । भारत कम निर्यात करता था और अधिकतम एक प्रमुख तेल आयातक देश होने के कारण, भारत को विदेशी मुद्राओं में भारी मात्रा में ऋण लेने के लिए मजबूर हो गया। इससे बाहरी ऋण का बोझ बढ़ गया और धीरे-धीरे रुपये का मूल्य गिर गया ।
1980 में भारत को राजकोषीय घाटे, बढ़ती मुद्रास्फीति और सीमित विदेशी पूंजी का सामना करना पड़ा। महात्मा गांधी की तस्वीर छपा रुपया कमजोर होता गया और 1990 तक लगभग ₹17.50 प्रति अमेरिकी डॉलर हो गया था।
1990 की शुरुआत तक, भारत गहरे संकट में आ गया । 1990 के खाड़ी युद्ध की वजह से तेल की कीमतों फिर से आसमान छूने लगी। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया, जो बामुश्किल दो सप्ताह के आयात के लिए ही पर्याप्त था। देश अपने बाहरी ऋण पर पैसा देने की स्थिति में नहीं था ।
भारत को डूबने से रोकने के लिए, भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी दिया और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष IMF से Bailout पैकेज मांगा। जिसकी वजह से उसे अपनी अर्थव्यवस्था को खोलना पड़ा।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव आया वर्ष 1992 में दोहरी विनिमय दर की शुरुआत हुई और 1993 में बाजार-निर्धारित विनिमय दर में परिवर्तन आने लगा । जिसकी वजह से रुपए का मूल्य विश्व स्तर की बढ़ती मांग और उसकी पूर्ति से निर्धारित होगा । जिसकी वजह से रुपए में संवेदनशीलता दिखाई देने लगी।
दशक के अंत तक, रुपये का मूल्य गिरकर लगभग ₹43 प्रति डॉलर हो गया था।
2000 के दशक में भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी आने लगी जिसका मुख्य कारण था निर्यात, IT के क्षेत्र और विदेशी निवेश लेकिन फिर भी रुपये ₹44 से ₹48 प्रति अमेरिकी डॉलर के बीच उतार-चढ़ाव करता रहा क्योंकि अभी भी तेल के आयात पर निर्भरता बनी रही।

सबसे बड़ा वित्तीय संकट वर्ष 2008 में आया। भारतीय बाजारों से विदेशी निवेशकों ने हाथ खींच लिया। वैश्विक मांग गिरावट के कारण रुपये में फिर से भारी गिरावट आई। निर्यात में कमी आई, शेयर बाजार की कीमतें धड़ाम से गिर गई।
इसके बाद विश्व स्तर पर बाजार में सुधार शुरू हुआ, लेकिन व्यापार घाटे और चालू खाता घाटे के कारण भारतीय रुपया दबाव में रहा। 2011-2013 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार की अवधि हमारे लिए विशेष रूप से कठिन रही।
विश्व स्तर पर तेल की कीमतें आसमान छू रही थी । सोने का आयात बढ़ा और भारत का चालू खातों का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 4% से अधिक हो गया था । मुद्रा के अवमूल्यन के कारण वर्ष 2014 में रुपया ₹60 प्रति अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया।

वर्ष 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद , मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और जीएसटी की शुरुआत हुई जिससे विदेशी मुद्रा निवेश में वृद्धि के रास्ते खुले।
अमेरिकी ब्याज की दरों में वृद्धि विश्व स्तर पर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने रुपये को गिरा दिया और विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की सिर्फ अपने देश का लाभ की व्यापार नीतियों ने रूपये को गिरा दिया। वर्ष 2018 में रुपया ₹70 प्रति अमेरिकी डॉलर तक गिर गया।

लेकिन 2020 में करोना की महामारी ने सब कुछ हिला दिया , जिसमें निर्यात के प्रतिबंध होने के कारण और लॉकडाउन की स्थिति में भारतीय GDP में गिरावट आ गई जिसके कारण रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। इसके साथ साथ भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पहली बार 600 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका था जिससे भारत को बहुत सहारा मिला।
लेकिन फिर रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हो गया अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा आक्रामक ब्याज दरों में वृद्धि हुई, और 2022 मे भारतीय रुपये को डॉलर के मुकाबले 80 रुपये के पार धकेल दिया। फिर भी भारत को कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम झटका लगा।

2022 के बाद से, भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है जो 2025 के अंत तक ₹90-₹91 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिसका मुख्य कारण अमेरिकी ब्याज की दरों में लगातार वृद्धि , विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से पूंजी निकालना, इसके साथ साथ भू, राजनीतिक तनाव है । आज यह एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक बन गया है और 15 जनवरी 2026 को रुपए की कीमत 90.36 प्रति डॉलर हो गई ।
मजबूत घरेलू मांग, डिजिटल दृष्टिकोण और बढ़ते विनिर्माण की वजह से भारत आज भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है ।
