बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा में एक बार फिर बड़ा उलटफेर हुआ है। पार्टी प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से बाहर कर दिया है। खास बात यह है कि आकाश आनंद को लेकर मायावती का यह पहला बड़ा फैसला नहीं है। इससे पहले भी उन्हें जिम्मेदारियों से हटाया गया, पार्टी से बाहर किया गया और फिर वापस लाया गया। लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा गंभीर नजर आ रहा है।आकाश आनंद के साथ इस पूरे विवाद में उनके ससुर और बसपा के पूर्व दिग्गज नेता अशोक सिद्धार्थ का नाम भी लगातार सामने आता रहा है। मायावती ने अशोक सिद्धार्थ पर आकाश आनंद को गुमराह करने और निजी हितों को पार्टी से ऊपर रखने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। इसके बाद मायावती ने साफ कहा था कि अगर आकाश आनंद को पार्टी में स्वतंत्र रूप से काम करना है तो अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से पूरी तरह दूरी बनानी होगी।अशोक सिद्धार्थ ने मायावती की बात मानते हुए राजनीति से संन्यास का ऐलान भी कर दिया। लेकिन इसके बाद भी आकाश आनंद की पार्टी में वापसी नहीं हुई। उल्टा मायावती ने उन्हें पार्टी से ही बाहर कर दिया। ऐसे में सवाल बड़ा है कि आखिर मायावती और आकाश आनंद के बीच ऐसा क्या हुआ कि रिश्ते बार-बार सुधरने के बाद फिर टूटते चले गए?
औरंगाबाद के भाषण से शुरू हुई थी टकराव की कहानी
इस पूरी कहानी को समझने के लिए करीब तीन साल पीछे जाना होगा। नवंबर 2023 में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में बसपा के एक कार्यक्रम में आकाश आनंद ने करीब 22 मिनट का भाषण दिया था।इस भाषण में आकाश आनंद ने पार्टी के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कार्यकर्ताओं से पूछा था कि क्या पार्टी में ऊंचे पदों पर बैठे कुछ लोग बसपा को बाहर के लोगों से ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं? उन्होंने यह सवाल भी उठाया था कि क्या पार्टी में योग्य लोगों को उनकी क्षमता के हिसाब से जिम्मेदारी मिल रही है आकाश ने यह भी कहा था कि पार्टी के सामने कई समस्याएं हैं, लेकिन केवल समस्या पहचान लेना काफी नहीं है। उसका समाधान भी निकालना जरूरी है। उन्होंने दूसरी राजनीतिक पार्टियों के सोशल मीडिया और उनके युवा संगठनों का उदाहरण देते हुए कहा था कि बसपा को भी बदलते समय के साथ खुद को बदलना होगा। युवाओं को संगठन में ज्यादा जगह देने और नई तकनीक के इस्तेमाल पर भी उन्होंने जोर दिया था। यह भाषण इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि बसपा में पार्टी की लाइन और संगठन को लेकर अंतिम फैसला लंबे समय से मायावती के हाथ में रहा है। ऐसे में पार्टी के अंदर से किसी बड़े नेता की ओर से खुले मंच पर बदलाव की बात करना अपने आप में बड़ी बात थी।
दिलचस्प बात यह है कि इस भाषण के कुछ ही समय बाद आकाश आनंद को मायावती ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।10 दिसंबर 2023 को मायावती ने आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी बनाया और उन्हें नेशनल कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी भी दी। उस समय साफ दिखाई दे रहा था कि मायावती आकाश को बसपा की अगली पीढ़ी के नेतृत्व के तौर पर तैयार कर रही हैं।लेकिन इसके बाद दोनों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव शुरू हो गया।
उत्तराधिकारी बने, फिर हटे और दोबारा वापस आए
7 मई 2024 को मायावती ने अचानक आकाश आनंद से उनकी बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारियां वापस ले लीं। उत्तराधिकारी का पद भी चला गया और नेशनल कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी भी। मायावती ने उस समय आकाश को राजनीतिक रूप से अपरिपक्व बताया था। यानी कुछ महीने पहले जिस नेता को बसपा का भविष्य बताया जा रहा था, वही नेता अचानक पार्टी की बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार नहीं माना गया।
हालांकि यह दूरी ज्यादा लंबी नहीं चली।
23 जून 2024 को मायावती ने फिर आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी बना दिया। उन्हें नेशनल कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी भी वापस मिल गई।इससे एक बात साफ हो गई कि मायावती और आकाश के बीच नाराजगी के बावजूद दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ था।लेकिन कहानी में एक और नाम लगातार मजबूत होता गया और वह नाम था अशोक सिद्धार्थ।अशोक सिद्धार्थ कभी मायावती के बेहद भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे। पेशे से डॉक्टर रहे अशोक सिद्धार्थ ने मायावती के कहने पर सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति का रास्ता चुना था। वह बसपा संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे, विधान परिषद पहुंचे और बाद में राज्यसभा सांसद भी बने।
इसी दौरान उनकी बेटी प्रज्ञा सिद्धार्थ की शादी आकाश आनंद से हुई। यानी अशोक सिद्धार्थ सिर्फ बसपा के वरिष्ठ नेता नहीं रहे, बल्कि मायावती के भतीजे के ससुर भी बन गए।यहीं से राजनीतिक और पारिवारिक रिश्ते आपस में जुड़ गए।
अशोक सिद्धार्थ पर मायावती की नाराजगी क्यों बढ़ी?
मार्च 2025 में एक बार फिर मायावती और आकाश आनंद के बीच दूरी सामने आई। 2 मार्च को आकाश से उनकी सभी बड़ी जिम्मेदारियां वापस ले ली गईं और अगले ही दिन उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया।मायावती ने आकाश पर राजनीतिक अपरिपक्वता के अलावा अपने ससुर अशोक सिद्धार्थ के प्रभाव में आने के आरोप लगाए। उनका कहना था कि आकाश के व्यवहार में स्वार्थ और अहंकार जैसी बातें दिखाई दे रही थीं।लेकिन कुछ समय बाद आकाश की फिर वापसी हुई। 13 अप्रैल को उन्हें पार्टी में वापस लिया गया। इसके बाद मई में उन्हें चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी दी गई और अगस्त में राष्ट्रीय संयोजक का नया पद बनाकर उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई।उधर अशोक सिद्धार्थ पर भी कार्रवाई का सिलसिला चलता रहा। 2 अगस्त को मायावती ने उन्हें बसपा से बाहर कर दिया। इससे पहले भी संगठन में गुटबाजी और पार्टी के खिलाफ गतिविधियों के आरोपों के बीच अशोक सिद्धार्थ पर कार्रवाई हो चुकी थी।लेकिन यहां भी कहानी खत्म नहीं हुई। उनकी पार्टी में वापसी हुई और फरवरी 2026 में उन्हें राष्ट्रीय पदाधिकारियों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।यानी जिस नेता पर कार्रवाई होती थी, वही कुछ समय बाद फिर पार्टी के शीर्ष स्तर पर दिखाई देने लगता था।यही उतार-चढ़ाव बसपा के अंदर अशोक सिद्धार्थ की भूमिका को लेकर सवाल खड़े करता रहा।
मायावती ने कहा- पहले संन्यास लो, फिर आकाश की बात होगी
मौजूदा विवाद में मायावती ने अशोक सिद्धार्थ को लेकर सबसे कड़ा रुख अपनाया। मायावती का कहना था कि अगर आकाश आनंद को पार्टी में स्वतंत्र होकर काम करना है तो उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से पूरी तरह संन्यास लेना होगा।मायावती का आरोप था कि अशोक सिद्धार्थ ने बहुजन आंदोलन और पार्टी के हितों की जगह निजी और पारिवारिक हितों को ज्यादा महत्व दिया। उनका यह भी मानना था कि इसका असर आकाश आनंद की राजनीति पर पड़ा।इसके बाद अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया।अपने बयान में उन्होंने मायावती के आदेश को अपने लिए सबसे ऊपर बताया। उन्होंने यह भी कहा कि वह आकाश आनंद को गुमराह नहीं कर रहे हैं और न ही पार्टी पर कब्जा करने की कोई कोशिश कर रहे हैं।उनका कहना था कि आकाश उनके दामाद जरूर हैं, लेकिन उससे पहले वह मायावती के भतीजे हैं और आकाश को मायावती से बेहतर कोई नहीं समझ सकता।यहां तक तो लगा कि शायद अब आकाश आनंद की बसपा में वापसी का रास्ता साफ हो गया है।
लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उलटा।
अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास लेने के बाद मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से बाहर कर दिया।यहीं से इस पूरी कहानी का सबसे अहम सवाल सामने आता है—क्या विवाद सिर्फ अशोक सिद्धार्थ को लेकर था या असली समस्या मायावती और आकाश आनंद के बीच भरोसे की कमी बन चुकी थी?बताया जा रहा है कि अशोक सिद्धार्थ के संन्यास के बाद आकाश आनंद से मायावती की पोस्ट को रिपोस्ट करने और सार्वजनिक तौर पर उनका धन्यवाद करने को कहा गया था। लेकिन आकाश इसके लिए तैयार नहीं हुए।
सूत्रों के मुताबिक, आकाश का मानना था कि वह कुछ भी कर लें, मायावती को उन पर भरोसा नहीं है। यहां तक कि वह इस बार पार्टी में कोई पद लेने के लिए भी तैयार नहीं थे।बताया गया कि आकाश बिना किसी पद के पार्टी के लिए काम करना चाहते थे। उनके पिता आनंद कुमार ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।इसके बाद मायावती ने आकाश को पार्टी से बाहर करने का फैसला लिया।यानी इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ ससुर-दामाद की राजनीति के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे भरोसा, नेतृत्व शैली, संगठन में बदलाव और पार्टी के अंदर की पावर पॉलिटिक्स भी बड़ी वजह दिखाई देती है।रामजी गौतम और अशोक सिद्धार्थ के बीच खींचतान का एंगल
बसपा की अंदरूनी राजनीति में एक और नाम चर्चा में रहा है रामजी गौतम।
दावा किया जाता रहा है कि रामजी गौतम और अशोक सिद्धार्थ के बीच संगठन को लेकर खींचतान रही है। जब अशोक सिद्धार्थ का प्रभाव बढ़ा तो रामजी गौतम की भूमिका में बदलाव की चर्चा हुई और जब रामजी गौतम मजबूत हुए तो अशोक सिद्धार्थ का प्रभाव कम होने की बात सामने आई।हालांकि इन दावों को पार्टी के अंदर की राजनीति के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।अशोक सिद्धार्थ ने अपने संन्यास के बयान में भी कहा था कि उन पर पार्टी पर कब्जा करने और आकाश आनंद को गुमराह करने जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। उन्होंने इसे अपने राजनीतिक विरोधियों की साजिश बताया था।अब आकाश आनंद के बाहर होने के बाद मायावती ने नेतृत्व की नई व्यवस्था भी तैयार कर दी है। आकाश की जगह उनके पिता आनंद कुमार और रामजी गौतम को राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है।इसके साथ ही आकाश आनंद के छोटे भाई ईशान आनंद को भी संगठन में जिम्मेदारी मिलने लगी है। कई राज्यों की संगठनात्मक समीक्षा की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद अब उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।यही वजह है कि बसपा में अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ आकाश आनंद के बाहर होने का नहीं है।सवाल यह भी है कि क्या मायावती अब आकाश की जगह ईशान आनंद को आगे बढ़ाएंगी फिलहाल इतना जरूर साफ है कि आकाश आनंद और मायावती के बीच बार-बार बनी और बिगड़ी दूरी अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। औरंगाबाद के भाषण से शुरू हुई बदलाव की बात, उत्तराधिकारी बनने और हटने का सिलसिला, अशोक सिद्धार्थ की भूमिका और अब पार्टी से बाहर होने तक की कहानी बताती है कि बसपा के भीतर यह सिर्फ एक परिवार का विवाद नहीं, बल्कि नेतृत्व, भरोसे और संगठन पर नियंत्रण की बड़ी राजनीतिक कहानी बन चुकी है।
