नेपाल में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदा ने बड़ी तबाही मचा दी है। इस मुश्किल घड़ी में ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने नेपाल के लोगों के साथ एकजुटता जताई है। काठमांडू में आयोजित ‘नेपाल के साथ एकजुटता’ कार्यक्रम में सद्गुरु ने नेपाल के प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में 1 करोड़ रुपये की सहायता देने का ऐलान किया। साथ ही उन्होंने कहा कि हिमालय से जुड़े देशों को सिर्फ आपदा आने के बाद मदद के लिए आगे नहीं आना चाहिए, बल्कि पहले से मिलकर ऐसी परिस्थितियों से निपटने की तैयारी करनी चाहिए। सद्गुरु ने भारत, चीन, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान को साथ लेकर एक ‘हिमालयी बोर्ड’ बनाने का प्रस्ताव रखा। उनका कहना था कि हिमालय किसी एक देश की सीमा में बंधा हुआ नहीं है। इससे जुड़े पर्यावरण, ग्लेशियर, बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक चुनौतियां भी किसी एक देश की समस्या नहीं हैं। इसलिए सभी देशों को अपनी-अपनी सीमाओं और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर हिमालय की सुरक्षा के लिए साथ बैठना चाहिए।
हिमालय को बचाने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत
सद्गुरु ने कहा कि हिमालय दुनिया की सबसे खूबसूरत और भव्य प्राकृतिक संरचनाओं में से एक है, लेकिन यह बेहद नाजुक भी है। पहाड़ों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी देश की राजनीति क्या है, वहां कौन सी भाषा बोली जाती है या देशों के बीच किस तरह के मतभेद हैं। पहाड़ अपनी जगह पर हैं और उनसे जुड़ी प्राकृतिक चुनौतियों का असर सीमाओं के दोनों तरफ रहने वाले लोगों पर पड़ता है। उन्होंने सुझाव दिया कि जिन देशों में हिमालय का क्षेत्र आता है, उनके बीच ऐसी संस्था बनाई जानी चाहिए, जहां सभी देश नियमित रूप से बैठकर सलाह-मशविरा कर सकें। जरूरी नहीं कि सभी देश मिलकर एक ही व्यवस्था चलाएं, लेकिन कम से कम आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और हिमालय से जुड़ी चुनौतियों को लेकर उनके बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए।सद्गुरु ने कहा कि अगर हर बार यह सोचकर समस्या को छोड़ दिया जाए कि यह सिर्फ नेपाल की परेशानी है और नेपाल ही इसे संभालेगा, तो इसका स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। हिमालय से जुड़े देशों को यह समझना होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक क्षेत्र को सुरक्षित रखना सभी की साझा जिम्मेदारी है।
900 से ज्यादा मौतें, कई लोग अब भी लापता
नेपाल में आई इस भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदा में 900 से ज्यादा लोगों की मौत होने की बात सामने आई है, जबकि बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। इस आपदा का असर ईशा फाउंडेशन से जुड़े लोगों पर भी पड़ा है। कैलाश यात्रा पर गए ईशा के 77 सदस्य चीन की तरफ गियिरोंग इमिग्रेशन सेंटर में थे, जिनके लापता होने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा नेपाल की तरफ ईशा के तीन स्वयंसेवकों के भी लापता होने की बात सामने आई है। सद्गुरु ने कहा कि इस तरह की बड़ी प्राकृतिक घटना का किसी ने अनुमान नहीं लगाया था। उन्होंने ग्लेशियर के बड़े हिस्से के पहाड़ की चोटी से करीब 4000 फीट नीचे गिरने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इतनी बड़ी घटना के बारे में पहले से अंदाजा लगाना मुश्किल था। लेकिन अब जब ऐसी घटना हो चुकी है, तो इससे सबक लेकर आगे की तैयारी करना जरूरी है।उन्होंने साफ कहा कि नेपाल जैसा देश इस तरह की बड़ी आपदा का सामना अकेले नहीं कर सकता। राहत और बचाव के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटनाओं के असर को कम करने के लिए दूसरे देशों को भी साथ आना होगा।
आपदा को सिर्फ दैवीय घटना मानकर नहीं छोड़ना चाहिए
कार्यक्रम के दौरान अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने सद्गुरु से पूछा कि इतनी बड़ी प्राकृतिक तबाही के बाद लोगों को क्या सीख लेनी चाहिए। इसके जवाब में सद्गुरु ने जीवन की नश्वरता और प्राकृतिक घटनाओं को समझने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इंसान को किसी बड़ी आपदा के आने का इंतजार नहीं करना चाहिए। हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि जीवन नश्वर है और यह बात हमेशा ध्यान में रखकर जिंदगी की योजना बनानी चाहिए। उनके मुताबिक, इससे इंसान अपने समय और जीवन को ज्यादा समझदारी के साथ जी सकता है।सद्गुरु ने लोगों से यह भी कहा कि प्राकृतिक आपदाओं को केवल किसी रहस्यमयी या दैवीय कारण से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। उनका कहना था कि भौतिक दुनिया में होने वाली घटनाएं भौतिक नियमों के आधार पर होती हैं। इसलिए किसी प्राकृतिक घटना को सिर्फ ‘ईश्वर की इच्छा’ कहकर छोड़ देना समस्या की असल वजह और उससे निपटने की जरूरत को कम कर सकता है।
मृतकों की शांति के लिए ईशा योग सेंटर में होगा अनुष्ठान
आपदा में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति संवेदना जताते हुए सद्गुरु ने बताया कि कोयंबटूर स्थित ईशा योग सेंटर में ‘काल भैरव कर्म’ किया जाएगा। उनके अनुसार यह मृत्यु के बाद किया जाने वाला विशेष अनुष्ठान है, जिसे स्वाभाविक और अस्वाभाविक दोनों तरह की मौतों के मामलों में किया जाता है। काठमांडू के ‘नेपाल के साथ एकजुटता’ कार्यक्रम में सद्गुरु का संदेश केवल तत्काल राहत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने हिमालय से जुड़े देशों को एक साथ लाने और आपदा प्रबंधन के लिए बेहतर तालमेल बनाने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि हिमालय किसी एक देश का नहीं है, इसलिए इसकी सुरक्षा और इससे जुड़ी प्राकृतिक चुनौतियों से निपटना भी सभी की साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए।
