ट्रंप की नई रक्षा रणनीति से बदला वैश्विक समीकरण नाटो और सहयोगी देशों को साफ संदेश अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाएं

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। ट्रंप प्रशासन की ओर से एक नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति जारी की गई है, जिसने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के रिश्तों को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस रणनीति में साफ कहा गया है कि अब अमेरिका दुनिया भर के देशों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अकेले नहीं उठाएगा।

यह रणनीति करीब 34 पन्नों का आधिकारिक दस्तावेज है, जिसमें यूरोप से लेकर एशिया तक के कई सहयोगी देशों की नीतियों और रवैये पर सवाल उठाए गए हैं। अमेरिका का मानना है कि दशकों से कई देश अपनी सुरक्षा के लिए जरूरत से ज्यादा अमेरिका पर निर्भर रहे हैं।

नाटो और सहयोगी देशों पर सीधी टिप्पणी

नई रक्षा नीति में नाटो देशों को लेकर कड़ा रुख अपनाया गया है। दस्तावेज में कहा गया है कि नाटो के कई सदस्य देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं करते, जबकि संकट के समय वे अमेरिकी सैन्य ताकत पर निर्भर रहते हैं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह संतुलन अब बदला जाना चाहिए। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि अब सहयोगी देशों को अपनी सेनाओं को मजबूत करना होगा, रक्षा बजट बढ़ाना होगा और क्षेत्रीय खतरों से निपटने की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। अमेरिका हर बार पहला रक्षक बनने की भूमिका नहीं निभाएगा।

अमेरिका की प्राथमिकता बदली

नई रणनीति में अमेरिका की प्राथमिकताओं में भी बड़ा बदलाव दिखता है। अब सबसे ऊपर अमेरिकी सीमा और आंतरिक सुरक्षा को रखा गया है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अमेरिका को पहले अपने नागरिकों और अपने क्षेत्र की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए, न कि हर वैश्विक संघर्ष में आगे बढ़कर दखल देना चाहिए।

इस नीति के तहत अमेरिका अपनी सैन्य ताकत को सीमित और रणनीतिक रूप से इस्तेमाल करेगा। अनावश्यक युद्धों और लंबे सैन्य अभियानों से दूरी बनाने की बात भी कही गई है।

यूरोप और एशिया को संदेश

दस्तावेज में यूरोपीय देशों के साथ-साथ एशियाई साझेदारों को भी चेताया गया है। रूस, उत्तर कोरिया और क्षेत्रीय तनाव जैसे मुद्दों से निपटने में अब संबंधित देशों को ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अमेरिका समर्थन देगा, लेकिन नेतृत्व की जिम्मेदारी स्थानीय देशों की होगी।

विशेष रूप से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका ने संकेत दिया है कि चीन को लेकर रणनीतिक संतुलन बनाए रखा जाएगा, लेकिन सहयोगी देशों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी।

वैश्विक प्रतिक्रिया और असर

इस नई नीति के बाद कई सहयोगी देशों में चिंता देखी जा रही है। यूरोप के कुछ देशों ने आशंका जताई है कि अमेरिका का यह रुख वैश्विक सुरक्षा ढांचे को कमजोर कर सकता है। वहीं, ट्रंप समर्थक इसे अमेरिका फर्स्ट नीति की मजबूती के रूप में देख रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है।

कुल मिलाकर, ट्रंप की यह नई रक्षा रणनीति अमेरिका की भूमिका को सीमित लेकिन निर्णायक बनाने की कोशिश है। संदेश साफ है—अब दुनिया की सुरक्षा का बोझ अकेले अमेरिका नहीं उठाएगा। सहयोगी देशों को अपने पैरों पर खड़ा होना होगा और अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी।