लखनऊ/ उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में युवाओं और Gen-Z वोटरों की चर्चा भले ही सबसे ज्यादा होती हो, लेकिन जमीन पर चुनावी समीकरण सिर्फ युवा मतदाताओं से तय नहीं होते। गांव से लेकर शहर तक ऐसे कई बड़े वोटर वर्ग हैं, जिनका सीधा संबंध परिवार, खेती, रोजगार, महंगाई और सरकारी योजनाओं से है। CSDS-Lokniti के उत्तर प्रदेश पोस्ट-पोल सर्वे के आंकड़ों पर नजर डालें तो गृहिणी, किसान-मजदूर और बुजुर्ग वर्ग चुनावी तस्वीर में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। सर्वे के मुताबिक 30.2 प्रतिशत उत्तरदाता गृहिणी थीं। वहीं किसान, खेतिहर मजदूर और मजदूरों को मिलाकर यह आंकड़ा करीब 29.4 प्रतिशत बैठता है। इसके अलावा 56 साल और उससे अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 19.2 प्रतिशत दर्ज की गई। घर पर रहने वाले बुजुर्गों की अलग प्रोफेशन कैटेगरी 7.7 प्रतिशत रही। दूसरी तरफ 25 साल तक के युवा उत्तरदाताओं की हिस्सेदारी 12.3 प्रतिशत थी।यानी चुनावी रणनीति बनाने वाले दलों के लिए इन वर्गों को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
महंगाई, विकास और रोजगार जैसे मुद्दे सीधे वोट से जुड़े
इन वर्गों की खासियत यह है कि इनका रोजमर्रा के जीवन से सीधा जुड़ाव है। गृहिणियों के लिए घर का खर्च, राशन, गैस, महंगाई और परिवार की आमदनी जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। किसान और मजदूर के लिए फसल का दाम, खेती की लागत, रोजगार और कमाई अहम सवाल हैं। वहीं बुजुर्गों के लिए सरकारी मदद, परिवार की आर्थिक स्थिति और सुरक्षा जैसे मुद्दे मायने रखते हैं। CSDS के 2022 के सर्वे में भी मतदाताओं के बीच महंगाई, विकास और बेरोजगारी जैसे मुद्दों का असर दिखाई दिया था। महंगाई के सवाल पर 63.4 प्रतिशत वैध उत्तरदाताओं ने माना था कि इसका उनके मतदान फैसले पर बहुत या काफी असर पड़ा। विकास को लेकर यह आंकड़ा 73.8 प्रतिशत और बेरोजगारी के मामले में करीब 70.7 प्रतिशत रहा। इससे साफ है कि चुनाव में सोशल मीडिया पर चलने वाले मुद्दों के साथ-साथ लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां भी वोटिंग के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं।
गृहिणियों से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग का अपना गणित
गृहिणियों की 30.2 प्रतिशत हिस्सेदारी चुनावी गणित में बेहद महत्वपूर्ण है। महिलाएं खुद मतदान करती हैं और घर के खर्च तथा परिवार की जरूरतों से जुड़े मुद्दों को करीब से देखती हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी महिलाएं एक ही पार्टी या मुद्दे के पक्ष में मतदान करती हैं। किसान और मजदूर वर्ग भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में अहम भूमिका निभाता है। खेती की लागत, फसल की कीमत, मजदूरी, रोजगार और परिवार की आय जैसे मुद्दे इनके लिए सीधे असर डालते हैं। बुजुर्ग मतदाताओं की भूमिका भी कम नहीं है। परिवार में उनके अनुभव और सामाजिक प्रभाव के कारण चुनावी माहौल में उनकी राय को महत्व मिलता है। खासकर ग्रामीण इलाकों में स्थानीय मुद्दे और सरकारी योजनाओं का असर इनके फैसले में दिखाई दे सकता है।
Gen-Z से ज्यादा बड़ा वोट बैंक
सर्वे में 25 साल तक के मतदाताओं की हिस्सेदारी 12.3 प्रतिशत रही। इसके मुकाबले गृहिणी, किसान-मजदूर और बुजुर्गों से जुड़े वर्गों की संख्या काफी बड़ी दिखाई देती है। यही वजह है कि यूपी की राजनीति में सिर्फ युवा वोटरों पर फोकस करके पूरी चुनावी तस्वीर को समझना मुश्किल होगा। मुफ्त राशन जैसी योजनाओं का अनुभव भी मतदाताओं के बीच महत्वपूर्ण रहा। सर्वे में 28.8 प्रतिशत लोगों ने राज्य सरकार, 16.6 प्रतिशत ने केंद्र और 28.5 प्रतिशत ने दोनों सरकारों से मुफ्त राशन मिलने की बात कही थी। ऐसे में आने वाले चुनाव में पार्टियों के सामने चुनौती सिर्फ युवाओं को साधने की नहीं होगी। घर का बजट संभालने वाली गृहिणी, खेत और मजदूरी पर निर्भर परिवार और उम्रदराज मतदाता भी चुनावी नतीजों की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि यूपी की सियासत में Gen-Z के साथ इन बड़े वोटर वर्गों पर भी नजर रखना जरूरी होगा।
