उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच प्रक्रिया को लेकर अदालतों में लगातार सवाल उठ रहे हैं। मामला सिर्फ FIR दर्ज करने तक सीमित नहीं है। आरोपी का नाम FIR में कैसे दर्ज किया गया, जांच में सबूत और CCTV रिकॉर्ड कैसे जुटाए गए, गिरफ्तारी कब दिखाई गई और चार्जशीट किस आधार पर दाखिल की गई—इन सभी बिंदुओं पर अदालतों ने अलग-अलग मामलों में सवाल किए हैं। हाल के मामलों में सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणियों के बाद पुलिस की जांच प्रक्रिया चर्चा में है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान अलग-अलग जिलों की 10 चार्जशीट मंगाकर उनकी समीक्षा भी की।
मौके पर पकड़े गए आरोपी को FIR में बताया अज्ञात
बुलंदशहर के खुर्जा से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने FIR को लेकर गंभीर सवाल आया। आरोप था कि छेड़छाड़ की घटना के दौरानएकमोटरसाइकिल सवार को मौके पर पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया था। इसके बावजूद FIR में आरोपी को अज्ञात बताया गया। बाद में जांच के दौरान उसका नाम जोड़ा गया और उसे क्लीन चिट दे दी गई। इसी मामले में अग्रिम जमानत से जुड़े विवाद के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुनवाई के दौरान बाइक के नंबर और शिकायत दर्ज होने के समय को लेकर भी सवाल उठे। पुलिस के हलफनामे से कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ और नया हलफनामा मांगा गया। SHO को भी व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए जरूरत पड़ने पर CBI जांच पर विचार करने की बात कही।
गिरफ्तारी और हिरासत की तारीख में भी सामने आया अंतर
इलाहाबाद हाई कोर्ट में कमलेश कुमार से जुड़े मामले में गिरफ्तारी और हिरासत की तारीख को लेकर सवाल उठा। रिकॉर्ड में गिरफ्तारी 19 अगस्त की दिखाई गई, जबकि पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक वह 15 अगस्त से ही हिरासत में थे। कोर्ट ने इसे गंभीर प्रक्रिया संबंधी गलती माना और 50 हजार रुपये मुआवजे का आदेश दिया।
एक अन्य मामले में कोर्ट के रिहाई आदेश के बावजूद करीब 20 घंटे तक रिहाई नहीं होने का मामला सामने आया। हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन पर भी सवाल किए और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।
CCTV और दस्तावेज सुरक्षित रखने पर भी सवाल
जांच के दौरान जरूरी दस्तावेज और सबूत सुरक्षित रखना भी पुलिस की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। यासीन के मामले में जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं होने से जमानत की सुनवाई में 10 दिन से ज्यादा की देरी हुई। वहीं देवरिया के एक मामले में पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं होने पर हाई कोर्ट ने सवाल उठाए। NSA यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत के मामलों में भी अदालतों ने प्रक्रिया की जांच की है। आकृति चौधरी के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने NSA हिरासत रद्द करते हुए 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया। वहीं संभल के मुल्ला अफरोज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने NSA हिरासत रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई। इन मामलों में अदालतों की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर रही कि पुलिस जांच के दौरान कानून में तय प्रक्रिया, रिकॉर्ड और दस्तावेजों का सही तरीके से पालन किया जाए। जनवरी से सितंबर 2026 के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने पुलिस और सरकारी अधिकारियों की कार्रवाई से जुड़े कई मामले आए, जिनमें मुआवजे और हर्जाने के आदेश भी दिए गए।
